बचपन
गाँव में बीता है। गाँव से जुडी खट्टी-मीठी बहुत सारी यादें हैं। इन्हीं में से एक
है पिताजी की गौ-प्रेम से जुडी यादें। न केवल वे स्थानीय गौशाला के कार्यक्रमों
में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे वरन घर पर एक गाय अवश्य रखा करते और बड़ी शिद्दत से उसकी
सेवा स्वयं करते थे। गाय की सेवा के लिए एक सेवक भी रख छोड़ा था। गाय को चारा,
दाना-पानी देना, बोरिंग पर ले जाकर उसे नहलाना और उसके शरीर से गोबर के धब्बे
मिटाना, फिर उसके सींगों और खुड़ों को सरसों के तेल से चमकाना आदि उसके नित्य के
काम थे। हम भाई बहन भी बढ़-चढ़ कर इस काम में योगदान करते। ख़ास कर चारा काटने के काम
में हमलोगों को विशेष मजा आता था। आपस में होड़ लगी रहती कि कौन कितना अधिक चारा
काटने में सफल हुआ। आज सोचता हूँ तो लगता है यह पिताजी का हम बच्चों पर किया गया
छोटा सा प्रयोग था जिससे वे हममें पशुओं के प्रति प्रेम और सहिष्णुता की भावना
जागृत करने में सफल हुए थे। गाय के बछड़े से खेलना बचपन में हम भाई-बहनों का प्रिय
शगल हुआ करता था।
एक दिन जब मेरे मित्र ने दिल्ली के एक गौशाला में चलने का निमंत्रण
दिया तो इन्हीं स्मृतियों से वशीभूत मैं सहर्ष तैयार हो गया। दरअसल मेरे मित्र को
उनके ज्योतिष ने गौ-सेवा हेतु चारा-दान करने को कहा था ताकि उनके ग्रह-गोचर की
वक्री दृष्टि को सीधा किया जा सके। अपने कसबे से मेरे जेहन में गौशाले की जो छवि
बनी थी कुछ ऐसा ही सोच मैं यहाँ आने को तैयार हुआ था। किन्तु महानगर में
स्थितियां एकदम पलट थी। भीड़-भाड़ वाले इलाके में अवस्थित इस गौशाले के अंदर जालियों
के पीछे बहुत कम स्थान में लगभग एक दर्ज़न गायें खड़ी थी। हर गाय के सामने एक नाद था
जिसमे बासी और सूखा चारा पड़ा था। जैसे मंदिर में भगवान् पर चढ़ावा चढाने हेतु भक्तों
की लाइन लगी रहती है उसी प्रकार यहाँ भी गौ को चारा-दान के लिए भक्तों की लाइन लगी
थी। गौशाला का सेवादार हर आने वाले से दान की राशि पूछ कर गौशाला के सामने के चारा
मशीन पर से चारा लाने को कह रहा था। इस चारे को वह एक स्थान पर रखवाता और फिर
भक्तों के हाथ से दो मुट्ठी चारा गायों को दिलवाता। गौशाले के अंदर हालाँकि पंखे
चल रहे थे किन्तु साफ़-सफाई का कोई विशेष ध्यान नहीं था। गर्मियों में पानी की कमी
की वजह से अथवा अधिक पैसे बनाने की मंशा से- पानी की समुचित व्यवस्था पर ध्यान
नहीं दिया गया था। गौशाले के अंदर का माहौल घुटन भरा था। इस भीड़-भाड़ वाले इलाके से
इन गायों को कभी खुले में ले जाने का तो सवाल ही नहीं था। प्राकृतिक परिवेश यानी
मैदानों में चरने के अपने अधिकार से वंचित रहने की त्रासदी झेलने को मजबूर इन मूक
पशुओं के स्वास्थ्य पर इसका असर स्पष्ट झलक रहा था। यह गौशाला वस्तुतः इन गायों की
सेवा-स्थली कम इनके ठेकेदारों की व्यापार-स्थली अधिक दिख रही थी। मैंने देखा महज
एक घंटे में जितना चारा उस चारा मशीन से इस गौशाले में भक्तों के माध्यम से पहुंचा
वह वहां मौजूद गायों की एक सप्ताह की खुराक रही होगी। मतलब साफ़ था। मंदिर के
प्रसाद की ही तरह यहाँ भी दुकान से गौशाला और फिर गौशाले से वापस पुनः उसी दुकान
पर चारे की री-साइकिलिंग हो रही थी। गौ-सेवा के नाम पर चल रहे इस गोरखधंधे में
गौशाला समिति और चारा मशीन वाले दोनों मुनाफे में थे। कौन कहता है गौ माता का
अनाधिकृत व्यापार पर लगाम कस लिया गया है? गौ माता के नाम पर और कितने व्यवसाय
चमक रहे हैं इसका पता मुझे उस दिन गौशाला जाने पर ही चल पाया। पशुओं पर जुल्म
(एट्रोसिटी) के कितने तरीके हो सकते हैं यह भी मैंने उसी दिन जाना।

