आज सर्वत्र शांति व्याप्त है। आजकल चुनाव
घोषणा से दहशत सी होती है। चहु ओर एक ऐसी खिचखिच सी मच जाती है जिसके शोर-
शराबे में चुनाव संपन्न होने तक के लिए देश के समस्त महत्वपूर्ण मुद्दे नेपथ्य में
चले जाते हैं।
एक समय था जब आदर्श चुनाव संहिता जैसी बंदिशें
नहीं थी। पार्टी नेता सीधे-सीधे वोटरों से संपर्क बना उन्हें लाभान्वित करते
थे और चुनाव जीतते थे। कुछ
इतने प्रभावशाली थे कि वोट माँगने अपने चुनाव क्षेत्र में जाते भी न थे किन्तु चुनाव जीतते
थे। चुनावी खर्चों में हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी को देखते हुए आदर्श आचार संहिता
लागू हुआ ताकि सारी प्रक्रिया में पारदर्शिता आये और चुनाव खर्चों में कैफियत बरती
जा सके। किन्तु चुनाव खर्चे में कोई कमी नहीं देखी गई। कहीं कैश तो कहीं
काइंड में वोटरों को लुभाने में हर राजनैतिक दल आज भी लगा है। सीधे-सीधे
मैनिफेस्टो में ही मुफ्त दी जाने वाली सुविधाओं और सेवाओं का जिक्र कर दिया जाता
है बिना यह सोचे-समझे कि देश की अर्थव्यवस्था पर ऐसी मुफ्तखोरी का क्या असर पड़ेगा। आदर्श चुनाव संहिता यहाँ
बेअसर दिखता है।
जब देश पिछड़ा था तब कतिपय नेता जाति पर वोट माँगते
थे। नया-नया स्वतंत्र देश का वोटर तब अनपढ़ और गरीब था। किन्तु उसमें
इतनी समझ थी वो उन्हें वोट देता था जिनका योगदान स्वतंत्रता संग्राम में रहा था। यही
वजह थी बिहार में कमजोर समझे जाने वाले कायस्थ जाति के भी तमाम नेता उन दिनों बिना
जाति सपोर्ट के चुनाव जीतते थे। अब जहाँ अपना देश अंतराष्ट्रीय मंचों पर
आधुनिक और प्रगतिशील कहाये जाने के लिए अपना दावा ठोकता है वहां स्वतंत्रता के
सत्तर सालों बाद आज भी आरक्षण जारी है और जाति आधार पर वोट माँगने का चलन पहले के
मुकाबले और जोर पकड़ चुका है। देश और समाज को बांटने वाली जाति व्यवस्था और
धार्मिक उन्माद को नियंत्रित करने में भी आदर्श चुनाव संहिता बेअसर दिखता है। जिस
प्रकार धर्म के नाम पर आजकल वोट माँगा जाने लगा है अंग्रेजी भाषा की दो
शब्दावलियाँ 'हिटिंग बिलो द बेल्ट' और 'स्टूप तो कॉन्कर' इस तुच्छ
मानसिकता को अच्छी प्रकार बयान करता है।
चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए अपना-अपना
कच्चा चिटठा वोटरों के समक्ष खोलने को अनिवार्य बनाया गया ताकि वोटर सूचित निर्णय
ले सके। किन्तु देखा गया है कि दिनोदिन ऐसे उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि
हुई है जिनपर संगीन आपराधिक मामले दर्ज़ हैं। और तो और वोटरों ने भी इन दागी
उम्मीदवारों को सिरे से नहीं नकारा। उनके दोष और आपराधिक पृष्ठभूमि उनकी जाति
की ओट में छिप गए। यानि यहाँ भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। आदर्श चुनाव संहिता लागू रहने के समय शहर से सरकार प्रायोजित बैनर एवं होर्डिंग हटा लिए जाते हैं और क्षितिज साफ़ हो जाता है। किन्तु
पर्यावरण को प्रदूषित करने विभिन्न दल युवाओं की मोटरसाइकिल जुलूस निकालते हैं जो
आम नागरिकों एवं राहगीरों के लिए चुनावों तक सरदर्दी का सबब बना रहता है। सरकारी
अफसरों की सर्विलांस ड्यूटी लगती है और पूरे महीने अघोषित धन और मदिरा की धड़-पकड़
चलती रहती है। यानि यहाँ भी राजनैतिक
दलों द्वारा आदर्श चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाने का प्रयास चलता रहता है।
टेलीविज़न खोलो तो उस पर भी चुनावी घमासान छिड़ा रहता है। किसी
भी चैनल पर संयत एवं शालीन भाषा में बहस सुनने को नहीं मिलता। चैनल अपने
राजनैतिक आकाओं की मर्ज़ी के अनुसार समाचार प्रसारित करते हैं। पार्टी के
प्रवक्ता इस कदर एक दूसरे की छीछालेदर करने में लगे रहते हैं कि प्रायः वे भूल
जाते हैं वे टेलीविज़न पर हैं। अक्सर ये बहस सास-बहु की नोक-झोंक को भी मात
करता नज़र आता है। बहस इस कदर असभ्य हो जाता है कि अंततः हमाम में सभी नंगे हो
जाते हैं। मुद्दों पर बहस की जगह
चारित्रिक हनन पर जोर रहता है। व्यक्तिगत लांछन लगाए जाते हैं और समस्त विश्व
के समक्ष हमारी 'सहृदयता' का मखौल उड़ता हैं। एक पक्ष समावेशी न होने का दोष
लगाता है तो दूसरा 'देशद्रोही' होने का। बस झोटम -झोट्टी और जूतमपैजार ही
बचता है। पता नहीं इन बहसों का क्या औचित्य है!
इन तमाम कमियों के बावजूद जब चुनावों की घोषणा
होती है तब जनता में एक उत्साह का माहौल देखा जाता है जो इस बात का द्योतक है कि
हमारा प्रजातंत्र और हमारा गणतंत्र स्वस्थ और चपल हैं। जनता चुनाव में वोट
डालने जाती है क्योंकि उसे बेहतर कल की उम्मीद रहती है। इसी उम्मीद पर तो
दुनिया टिकी है। उम्मीद यह भी है कि आने वाले वर्षों में आदर्श चुनाव संहिता
को और अधिक धार दिया जायेगा और इसका पैनापन इसे और कारगर बनाएगा ताकि हम शेषन के
सुधारों के बाद अगले पायदान की सुधारों की और उन्मुख हों और उन तमाम कमियों से देश
को मुक्ति मिले जो आज हमें चुनाव प्रक्रिया के दौरान देखने को मिलते हैं। बाकि
भारतीय प्रजातंत्र में सब ठीक-ठाक है।
