जब
कभी दीवारों पर लिखी इबारतें नहीं दिखती,
जनता
जनार्दन के इरादे नज़र नहीं आती
वो
तख्ता पलट अपने काम पर लौट जाता है
पांच
साल के लिए अन्य 'सेवक' को मुकुट सौंप आता है
यह
हार किसकी या जीत किसकी पर बहस जारी है
कौन
क्यों जीता या कैसे हारा की खिचखिच तारी है
कोई
उससे नहीं पूछता जिसकी यह समस्त कारगुजारी है
वो
कब का वोट देकर अपने काम पर लौट आया है
जो
स्वयं को सदा इनके सेवक मानते आये हैं
पर
किराये की कुर्सी को अपना मानते आये हैं
जब-जब
'सेवक' इस गफलत का शिकार होता है
'मालिक' 'सेवक' की गफलत सुधार जाता है
