Friday, 28 October 2016

शहर बनारस बातें बनारसी: बनारस से दिल्ली तक की यात्रा की हकीकतें डेढ़ किलोमीटर में (28/10/2016)

कासी हिन्दू विश्वविद्यालय के सामने महामना की प्रतिमा


दिल्ली डायरी में बनारस की बातें करना भले ही कुछ पाठकों को बेतुका लगे पर वर्त्तमान काल में दिल्ली की सत्ता के गलियारों का रास्ता बनारस की तंग गलियों से होकर ही जाता है अतः दिल्ली डायरी में बनारस की बनारसी बातें करना आज के दौर में न केवल सामयिक है वरन मेरा तो मानना है सन 2019 के चुनावों की गूँज भी बाबा विश्वनाथ के घंटे और घड़ियालों के बीच इसी शहर से समस्त दुनिया सुनेगी मेरा यह भी मानना है कि जैसे हर शख्स की शख्शियत भिन्न होती है वैसे ही हर शहर का शहरत्व भी भिन्न होता है और इसे जानने और समझने के लिए पूरे शहर को देखना आवश्यक नहीं होता जैसे अनाज के एक दाने को दबा कर पूरे देग के चावल का हाल जान लिया जाता है, किसी भी शहर में किलोमीटर दो किलोमीटर चल कर ही आप शहर की तबियत और ताव जान सकते हैं सुबह-सवेरे बनारस की प्रसिद्द गलियों में घूम कर मैंने भी इस शहर के नब्ज़ को समझने की कोशिश की मात्र डेढ़ किलोमीटर पैदल चल कर मैंने जो भी देखा उसे मैंने अपने कैमरे में कैद किया है
कासी हिन्दू विश्वविद्यालय का मुख्य द्वार 




बचपन से बनारस के बारे में सुनता आया हूँ- रांड, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी इससे बचे तो पहुंचे कासी मुझे यह अतिशयोक्ति लगती थी किन्तु इस डेढ़ किलोमीटर में मैंने जितने सांड देखे वह विस्म्यकारी था हर सांड अपने आप में लाजवाब और शारारिक सौष्ठव से पूर्ण विस्मित था यह सोच कर कि बाबा विश्वनाथ के ये प्रिय गण आते कहाँ से हैं और शहर में पुलिस के माफिक गस्त लगाने से इन्हें कोई रोकता क्यों नहीं?
शिव के गण आपको शहर में हर जगह दिखेगें डेढ़ किलोमीटर के फासले में मिले चंद गणों के ही फोटो यहाँ ब्लॉग पर दे रहा हूँ ये पूरे नहीं है इस डेढ़ किलोमीटर में नहीं तो एक दर्ज़न सांड अवश्य थे 

बनारस शहर से महामना मदन मोहन मालवीय की यादें जुडी हैं और स्मरण हो आता है उनके द्वारा स्थापित विश्व प्रसिद्द कासी हिन्दू विश्वविद्यालय सौ साल पहले स्थापित इस प्रसिद्द विश्वविद्यालय का मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल आज भी इस पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र का सबसे अच्छा मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल है विश्वविद्यालय परिसर में हॉस्पिटल के निकट बाबा विश्वनाथ भी विराजमान हैं विश्वविद्यालय की दीवार से सटे लगे बीसियों एम्बुलेंस इस बात का द्योतक थे कि सरकार सुदूर गावों में अब तक आधारभूत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में विफल रही है और सुदूर  गांवों के लोगों को कासी हिन्दू विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में इलाज़ कराने आने के लिए इन निजी एम्बुलेंस सेवाओं का ही सहारा है विश्वविद्यालय परिसर में सुबह-सवेरे रोगियों की भीड़ देख यह सोचने पर भी मजबूर हुआ कि क्यों नहीं स्वतंत्रतापरान्त ऐसी और सुविधाओं का समुचित विकास हुआ? कदाचित देश की जनसँख्या विकास के मुकाबले कहीं अधिक रफ़्तार से बढ़ी है
 
विश्वविद्यालय परिसर में अवस्थित हॉस्पिटल

कासी हिन्दू विश्वविद्यालय में गरीब मरीजों का आश्रय स्थल "आश्रय"
विश्वविद्यालय परिसर में अवस्थित शिव मंदिर
विश्वविद्यालय के बाउंड्री से लगे एम्बुलेंस की कतार



महामना मदन मोहन मालवीय की दिव्य मूर्ति के सामने ही एक तांत्रिक ओझा अपने करतब दिखा रहा था यह इसका नित्य का बिज़नेस था जैसा यह अपने आलाप में लोगों को बता रहा था लोग बेफिक्र इसे देखने में मगन थे यह बेफिक्री बनारस की तबियत में हैसाधु संतों के इस शहर में ऐसे सन्यासी आपको हर जगह दिख जायेगें। ऐसे साधु ही धर्म का बाजार लगाते हैं।

विश्वविद्यालय के सामने अपने करतब दिखाता एक तांत्रिक ओझा
बाबा विश्वनाथ की इस ऐतिहासिक नगरी में सड़क के बीचो-बीच स्थापित मंदिरों की कमी नहीं है आप किसी ओर भी निकल जाए आपको हर सड़क के बीचो-बीच मंदिर के दर्शन अवश्य होंगें इस डेढ़ किलोमीटर के दरम्यान ही तीन मंदिर सड़क के बीचो-बीच अवस्थित दिखे सड़क के बीचो-बीच अपने इष्ट देव की आराधना करना- यह कैसी आस्था है? - मुझे विचित्र लगा अन्य किसी भी शहर में दो एक मंदिर-मस्जिद सड़क के बीचो बीच यदा-कदा भले मिल जाएँ किन्तु बाबा विश्वनाथ की यह बनारस नगरी इस मामले में अद्वितीय है साधु और सन्यासियों ने संभवतः शहर के किसी भी सड़क को नहीं छोड़ा है और हर जगह सड़क के बीचो-बीच मंदिर स्थापित कर मानो सत्ता के शीर्ष को ललकारा है- क्या हमारे स्मार्ट सिटी का यह भी एक पैमाना होगा? मैं खुद से सवाल करता हुआ आगे बढ़ जाता हूँ। कहीं-कहीं तो चौराहे पर भी देवी और देवता ट्रैफिक पुलिस की मदद करते आपको दिख जायेगें


सड़क के बीचो-बीच अवस्थित मंदिर की बनारस में बहुतायत है 
कुछ ऐसे ही मंदिर जो मात्र डेढ़ किलोमीटर के फासले में मिले 
इसी डेढ़ किलोमीटर के फासले में मुझे एक टाइपराइटर सेण्टर भी मिल गया सरकार की कई लुभावनी योजनाओं की कलई खोलती टाइपराइटर सेण्टर पर कंप्यूटर के इस जमाने में ग्रामीण बालक और बालिकाओं को टाइपराइटर पर टाइपिंग करते देख बरबस सरकार की "स्किल इंडिया" और लैपटॉप आदि देने की अन्य घोषणाएं याद आ गयी बुलेट ट्रेन के इस ज़माने में बैलगाडी में सफर करते इन गरीब बच्चों के भविष्य से आखिर कब तक हमारे नेतागण इसी प्रकार खिलवाड़ करते रहेंगें? ऐसे स्किल इन बच्चों को कहाँ ले जायेगें- देश के नीति निर्धारकों के लिए यह सोचने का सबब होना चाहिए? वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा बनारस को "स्मार्ट सिटी" के तौर पर विकसित करने के संकल्प को शहर में चहु और फैली अतिक्रमण और गन्दगी मानो मुँह चिढा रही थी
कंप्यूटरयुगीन दौर में टाइपराइटर सेण्टर जो बनारस में धड़ल्ले से चलते हैं
स्वच्छ भारत अभियान को मुँह चिढाता कूड़े के ऐसे ढेर बनारस में हर जगह देखे जा सकते हैं
कासी हिन्दू विश्वविद्यालय के दीवारों से सटे गरीब जनता की झुग्गियां और छोटे-छोटे दुकानदारों की छोटी-छोटी दुकानें जिसे आम बहस में अतिक्रमण कहते हैं लाखों लोगों की जीविका बसर का जरिया है फिर वही सवाल मन में कौंधता है- पिछले सत्तर सालों में हमने क्या किया प्रश्न यह भी उठता है कि जो सत्तर सालों में न हो सका क्या उसे एक युग पुरुष पांच सालों में कर पायेगा यदि यह हो पाया तभी यह पुरुष वास्तव में युग-पुरुष कहलायेगा वरना लोगों को झूठे सपने दिखा कर दिल्ली की सत्ता पर तो कितनों ने ही कब्ज़ा जमाया है 
विश्वविद्यालय के बाउंड्री से लगे छोटे छोटे दुकानदारों की छोटी छोटी दुकानें
 
विश्वविद्यालय परिसर के बाउंड्री से लगे झुग्गी झोपडी की कतार

 
यूनियन के दफ्तर कासी हिन्दू विश्वविद्यालय के ठीक सामने 



इस डेढ़ किलोमीटर में ही हर पार्टी के पोस्टर और बैनर इस प्रकार चिपक गए हैं मानो चुनाव कल ही होने वाले हैं इन पोस्टरों में सदा की भाँति बड़े-बड़े वायदें किये गए हैं पर पोस्टरों के ठीक नीचे इन गरीबों की झुग्गियां और दुकानें इन सूरमाओं की कलई खोल कर रख देती है
बनारस में चुनाव पूर्व चुनावी गर्मी का मंजर
बनारस में चुनाव पूर्व चुनावी गर्मी का मंजर:बीसपी का चुनावी दीवार 
 


बनारस में चुनाव पूर्व चुनावी गर्मी का मंजरभाजपा का चुनावी बैनर 
















 वापस बनारस के लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन आ जाता हूँ बनारस में मैं आज भी शास्त्री की सादगी और सरलता पाता हूँ और पाता हूँ बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का रस जिसमें हर किसी को भाव विभोर करने की अध्भुत क्षमता है यह क्षमता यहां के पान में भी है और यहां के संगीत घरानों में भी मैं भाव विभोर हो कर बनारस से वापस दिल्ली लौट आया हूँ
 
बनारस का लाल बहादुर अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट

Friday, 21 October 2016

CAN THIS BE CALLED A NEWSPAPER? (21/10/2016)




Every morning I look forward for the newspaper. What I get in return is a bundle with lots and lots of advertisement right from the first page to the next six to seven pages. I still try to search for news in this bundle and I get to see many more advertisements in inner pages. This bundle of papers carrying advertisements is called newspaper in Delhi. I keep my search on for news in this bundle which I finally find tucked away in some ignominious corner a couple of pages inside. Headlines have lost the prime of place in newspapers which are published today. Even the honoured mast head has been compromised away for advertisements. Indeed advertisement plays an important role in keeping newspapers afloat but too much of it has killed the good old newspaper which we waited with baited breath every morning. The trend of publisihing the most headlines on first page has been replaced with full page advertisements that find a place on the first page of every newspaper in Delhi. Preventing people a peek at news without purchasing it might have led to this decision but the fact remains that newspapers ought to be bought to read news and not advertisement. As the festival season progresses, the thickness of daily newspaper increases so much so that its “raddi” (scrap) value outweigh the value of news that it carries. Else too the quality of news has reached its nadir. The loyalty of each newspaper rests, not with its readers but, their political masters and the news reflects the views of the political party rather than it being an objective analysis of events and happenings. To make matters worse, often they delve on visual delight to raise its sale while they are least bothered to satisfy the intellectual cravings of its readers. Publication houses have long compromised with their conscience and newspaper today can be called anything but a newspaper. It has been reduced to a pamphlet which provides minimal information to the person who buys it every morning in the hope of reading a newspaper.