Saturday, 8 October 2016

दिल्ली का दुर्गा पूजा (09/10/2016)




अग्रणी दुर्गा पूजा समिति (रोहिणी) द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा
 "मातः, दशभुजा, विश्वज्योति; मैं हूँ आश्रित;
हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित;
जनरंजन चरणकमल तल, धन्य सिंह गर्जित!
यह, यह मेरा प्रतीक मातः समझा इंगित,
मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनन्दित।"

-सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला की कालजयी रचना "राम की शक्तिपूजा" से
 
रावण से निरंतर युद्ध करते जब थक हार कर मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने हताश क्षणों में कातर हो कर शक्तिरूपेण देवी दुर्गा का आह्वाहन किया तब देवी ने प्रसन्न हो श्रीराम को विजय का आशिर्वाद दिया था कृत्तिवास रचित बंगला रामायण में यह प्रसंग आया है जहाँ शक्ति की देवी दुर्गा को सर्वपरि माना जाता है बचपन से ही नवरात्र में शक्तिरूपेण देवी दुर्गा की पूजा अर्चना करता और देखता आया हूँ क्योंकि पूर्व भारत में, जहाँ मेरा बचपन बीता है और जहाँ के विभिन्न शहरों में मेरी पोस्टिंग होती रही, वहां रामलीला की अपेक्षा दुर्गा पूजा प्रमुखता से मनाया जाता है अतः दिल्ली में नवरात्र के समय कुछ रीता-रीता सा लगता था कुछ पूर्वाग्रह भी था मसलन कोलकाता में जैसे हर जगह देवी दुर्गा की पूजा अर्चना के लिए भव्य पंडाल आराईश (शोभायमान) हो जाते हैं भला वैसे पंडाल दिल्ली में देखने को मिलेंगें भी अथवा नहीं कोलकाता में जैसे पूरे दस दिन ज़बर्दस्त चहल-पहल और रौनक रहती है वैसी चहल पहल क्या दिल्ली में भी देखने को नसीब होगी? पूर्व भारत में देवी पूजा का माहात्म्य यो भी अधिक है, पर पूरब भारत के लोग इस मौसम में जिस प्रकार सब कुछ भूल पूजा का मजा लेने में रम जाते हैं, लगता है और कोई काम करने को बचा ही न हो पूरब भारत का मिज़ाज़ "लाहे-लाहे" यानी "धीरे-धीरे" वाला है और यहाँ हर काम आराम से किया जाता है देवी की पूजा भी लोग पूरे आराम से इसमें पूरी तरह रम कर करते हैं। बंगाल में शरद ऋतू में दुर्गापूजा से देवी पूजा का  क्रम जो शुरू होता है वह एक के बाद एक देवी की पूजा के साथ एक माह तक अनवरत चलता ही चला जाता है- दुर्गा-पूजा, लक्ष्मी-पूजा, जगद्धात्रीदेवी-पूजा काली-पूजा। लगता है मानो सभी देवियों को शरद का मौसम पसंद है और पसंद है बंगाल की मेजबानी, जो एक के बाद एक देवी अपने नैहर आ हमें अभिभूत कर देती है। "बंगालीर बारह मासे तेरो पर्व" यानि बंगाल में बारह महीने में तेरह उत्सव मनाये जाते हैं मान्यता है दुर्गा पूजा बसंतोत्सव के तौर पर बसंत ऋतु में मनाया जाता था किन्तु आश्विन माह में रावण से युद्ध में विजय के लिए श्री राम को असमय देवी का आह्वान करना पड़ायह "अकाल बोधन" कहलाया। तब से दुर्गापूजा आश्विन माह में मनाया जाने लगा। पितृ पक्ष के अंतिम दिन महालया और तत्पश्चात "देवी पक्ष" शुरू हो जाता है। षष्टि के दिन बंगालीजन "देवी बोधन" करते हैं।

पीतमपुरा बंगाली एसोसिएशन द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा
बिहार और बंगाल में मनाये इसी दुर्गा पूजा की याद यहाँ दिल्ली में बहुत आती थी और मन दुखी हो जाता था। फिर मैंने दिल्ली में आयोजित दुर्गा पूजा देखने का मन बनाया और जब मैं दुर्गा पूजा पंडाल घूमने निकला तो विश्वास ही नहीं हुआ कि दिल्ली में भी दुर्गा पूजा उसी शिद्दत और भक्ति से आयोजित किये जाते हैं जैसे कोलकाता में। बंगाल की ही तरह दिल्ली में भी देवी "बाड़ी पूजा" एवं "सार्वजनीन पूजा" विधि से प्रतिस्ठित की जाती हैं। बहुधा हम स्वर्णिम अतीत को याद करते हुए वर्त्तमान के मौकों का लाभ उठाने से चूक जाते हैं और बिना वजह दुखी रहते हैं जबकि खुशियां सर्वत्र बिखड़ी पड़ी होती है और आवश्यकता बस इसे समेटने की होती है।
 
रोहिणी (दिल्ली) में एक अन्य स्थान पर आयोजित दुर्गा पूजा
आज महाष्टमी है। सुबह-सुबह अखबार खोला तो अन्य दिनों की ही तरह नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म और बलात्कार के समाचार पढ़ने को मिले। दिल्ली में ये घटनाएं इतनी अधिक हो गयी हैं लगता है हमारी संवेदनाएं मृत हो गयी हैं। हम अखबार का पन्ना पलट देते हैं किन्तु पन्ना पलटना इस समस्या का समाधान नहीं है। सुबह सैर को गया था तो पार्क में झुंड की झुंड कुमारी कन्याएं आज 'कंचक' पूजा में पूरी, चने और हलवे का प्रसाद और पैसे के लिए पार्क में इंतज़ार करती दिखी थी। इस विडम्बना से मन आहत हो जाता है। एक ओर इन कन्यायों की पूजा की जाती है और दूसरी ओर ये ऐसी क्रूरता का शिकार होती हैं। दुःख होता है कि देश का शासन-तंत्र और न्याय-तंत्र किंकर्तव्यविमूढ़ सा इन शर्मनाक घटनाओं को देखता रह जाता है। दोषियों को बहुधा सजा ही नहीं होती या फिर होती है तो इसमें वर्षों लग जाते हैं। देश के अंदर के इन महिसासूरों का मर्दन करने में हमारा शासन-तंत्र मानो पूरी तरह विफल हो गया है। 

इसी प्रकार देश की पश्चिम सीमा पर शत्रु देश को सबक सिखाने और तत्पश्चात हुई कारवाई पर देश के नेताओं के बीच मचे घमासान को देख कर भी मन दुखी हो जाता है। पिछले सत्तर वर्षों में हम इस समस्या का समाधान नहीं कर पाए हैं। परस्पर दोषारोपण का जो खेल देश में चल रहा है उसे देख कर लगता है आने वाले वर्षों में भी यह ऐसा ही चलता रहेगा। देवी को भी मानो श्री राम के अवतरण का इंतज़ार है जिसे वो आशिर्वाद दे देश को इन कलियुगी शत्रूओं से निजात दिल पाए। महाष्टमी के पावन अवसर पर आईये हम देवी दुर्गा का आह्वाहन करें और प्रार्थना करें को वो हमें सद्बुद्धि दे। 
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तसै नमस्तसै नमस्तसै नमो नमः
बंगाल का प्रसिद्द ढाक (ढोलक)


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