श्रावण का
बहुप्रतीक्षित माह हमें पुनः पावस की बूंदों के साथ भीगनें को आमंत्रित करने आ गया
है। दिल्ली देश की राजधानी है और सारे देश के शासन की
बागडोर यहीं से संचालित होती है। पिछले तीन वर्षों में
मानसून में बारिश की कमी ने शासकों की जान
को सांसत में डाल रखा था। बागडोर फिसलती लग रही थी पर
शुक्र है इस वर्ष भगवन इंद्र की कृपा-दृष्टि यहाँ के शासकों पर पड़ी और सही समय पर
मानसून ने दस्तक दिया। वातानुकूलित कमरों में बैठ कर जी.डी.पी.
पर बड़े-बड़े भाषण देने वालों की इज़्ज़त की बागडोर भगवन इंद्र के भरोसे है, इसे यहाँ
के किसान भी जानते हैं और आम आदमी भी। अतः समय पर आये
मानसून से जितने हर्षोल्लित देश के किसान हुए उससे कहीं ज्यादा संतोष की सांस यहाँ
के शासकों ने लिया। दिल्ली में अपने चार साल के प्रवास
में यह पहला अवसर है जब सावन में बारिश की बूंदों का इतना खुल कर मजा लेने का अवसर
मिला। इतनी बारिश पिछले तीन साल में दिल्ली में नहीं
हुई। दिल्ली में रहते हुए सावन और बैशाख/ज्येष्ठ माह के
बीच के अंतर को मानो भूलता ही जा रहा था।
इस बारिश का बहुत ही
महत्व है- किसानों के लिए और देश के शासकों के लिए भी।
किसान इसी बारिश की प्रतीक्षा साल भर करते हैं ताकि उनके श्रम का फल मिले- उनकी
खेती सफल हो और उनके घर में अनाज आ सके। अनाज की किल्लत कई
बार इस देश में तख्ता पलट का सबब बन चुकी है। इसलिए इस मानसून की प्रतीक्षा यहाँ के शासक भी बड़ी व्यग्रता से करते हैं।
इस साल दिल्ली में
सावन की बारिश पूर्वांचल की रिमझिम बारिश की याद दिला गया।
सावन माह के महत्व की और भी वजहें हैं। यही वह माह है जब
भगवन श्रीराम भी प्रसन्न हो देवी सीता संग मणि-पर्वत पर सावन झूले का आनंद लेते
हैं। झूला राधा-कृष्ण के प्रेम का पर्याय है. जहाँ राधा
हैं वहां श्रीकृष्ण हैं और वहां सावन के झूले हैं। इस बात
से राधा और श्रीकृष्ण के हर भक्त वाक़िफ़ है। किन्तु भगवन
श्रीराम और सीता को झूला झूलते देखने का नयनाभिराम अवसर भक्तों को साल में केवल एक
बार सावन माह में ही मिलता है।
सावन का महत्व इसलिए
भी है क्योंकि यही वह माह है जब शिव भक्त उत्साहित हो कर कांवड़ उठाते हैं और अपने
इष्ट पर दूर-दूर से गंगा का पवित्र जल ला कर समर्पित करते हैं।
देवघर के प्रसिद्द ज्योतिर्लिंग में कांवड़ियों के अथाह समंदर को मैंने देखा है। यहाँ दिल्ली में भी कांवड़ियों का वैसा ही मजमा देखने को
मिलेगा ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था। पर सावन माह के आते
ही पूरा दिल्ली प्रदेश मानो शिव-भक्त हो गया लगता है।
दिल्ली में हर चौराहे-चौबारे पर इनकी विश्रामस्थली स्थापित हो गए हैं। बोल-बम के नारे से सारा दिल्ली गुंजायमान है और भक्तों के इस
अथाह समंदर ने दिल्ली की सडकों पर विराम लगा दिया है। आज
ऑफिस जाते हुए कांवड़ियों के इसी जोश और जज़्बे से रु-ब-रु हुआ, जब प्रायः हर सड़क पर
कांवड़ियों की भीड़ थी और मेरे जैसे ही कई लोग कार्यालय विलम्ब से पहुचने को मजबूर। पर इन कांवड़ियों को देखने का भी एक अलग ही आनंद है। न सावन की बारिश और न ही दिल्ली की पुलिस इन्हें अपने लक्ष्य
से डिगा पायी।
सावन के माह में ही
हम देश के सबसे महत्वपूर्ण पर्व में से एक "स्वतंत्रता दिवस" मनाते हैं। दिल्ली के लिए यह एक महत्वपूर्ण पर्व है। यहीं
लाल किला है जिसके प्राचीर से देश के शासक बीते साल का लेखा-जोखा और आने वाले साल के
सपने सामने रखते हैं। यह वह दिन है जब हमें देश के प्रति
अपने कर्तव्य याद आते हैं और शासकों को अपने अधूरे काम।
यह एक दिन है जो हमें अपनी विफलताओं को उसी सिद्दत से याद दिलाता है जितनी सिद्दत
से कभी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन होम कर डाले
थे। आखिर कहाँ गए
वो लोग? और क्यों नहीं वो लोग पुनः देश के उद्धार को सामने आते हैं? जरा
सोचिये! और जब तक ऐसा न हो राष्ट्रकवि दिनकर
की कविता "दिल्ली" की इन पंक्तियों को गुनगुनाइए ताकि आपके भीतर के देशभक्त
का स्वाभिमान रौशन रहे:
भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब
भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में।
दिल्ली में तो है खूब
ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में।
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