पिछले दस दिनों से
देश में एक अफरा तफरी का माहौल कायम है। देश की सरकार ने जब से 500/- और हज़ार के
नोट वापस लेने का निर्णय लिया, ऐसा लगता है मानो सारा देश 500/- और हज़ार के नोट
वापस करने में लग गया है और यह सिलसिला निकट भविष्य में समाप्त होता नज़र नहीं आता।
यों तो टेलीविज़न और रेडियो के माध्यम से प्रधान मंत्री महोदय हर माह अपने “मन की
बात” जनता के समक्ष रखते थे किन्तु प्रधान मंत्री के मन ऐसी कोई बात भी होगी इसका
भान देशवासियों को कदापि नहीं था। प्रधान मंत्री के इस संबोधन ने जहां मन की बात
की गिरती टी.आर.पी. को नया जीवन दान दिया, वहीं प्रधान मंत्री के “मन की बात” से
बेजार हुई देश की जनता को एक सबक जो उन्हें न सुनने की गलती अब दोबारा कदापि नहीं
करेगी।
देश में यों तो भ्रष्टाचार
और काला धन सर्वत्र व्याप्त है और यह निर्णय इस दिशा में किया गया छोटा सा प्रयास, किन्तु इस छोटे से प्रयास ने विभिन्न राजनैतिक दलों में एक उफान खड़ा कर दिया है। देश
की विभिन्न राजनैतिक दलों के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ चुका है जो शालीनता की हर सीमा
पार कर चुका है। संध्या समय टेलीविज़न पर विभिन्न चैनलों पर राजनैतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं
के बीच चल रहा परस्पर "वाक युद्ध" आपको गली में सामानांतर चल रहे "कुक्कुर
युद्ध" को मात करता नज़र आएगा। फ्री स्टाइल कुश्ती की तर्ज़ पर जिसके गले में जितनी
शक्ति है वो उतनी ही शक्ति से अपनी बात रखने की कोशिश करता है और देश की जनता बिना
टिकट इस का मनोरंजन का आनंद लेती है। अवाम के गिरहबान में नज़र रखने और डालने वाले कब
अपनी गिरहबान पर नज़र डालेंगें और खुद को पाक साफ़ करेंगें यह देखना अभी बाकी है। काले
धन पर इस निर्णय का असर बहुत ही सीमित जन समुदाय में दिख रहा है और राजनैतिक दलों में
इसका कोई आर्थिक असर तो फिलहाल दिख ही नहीं रहा।
यो तो काला धन को
अमीर लोगों की थाती बताया जाता है पर इस घोषणा के बाद अमीरों और गरीबों की
जुगलबंदी देखने लायक है। देश की गरीब और बेरोजगार जनता को अमीरों के काला धन को
सफ़ेद करने का बैठे बिठाये नया रोजगार मिल गया और प्रतिदिन सुबह से ऐसे लोगों की
भीड़ बैंकों के सामने खड़ी होने लग गयी जिन्हें अमीरों ने अपना काला धन सफ़ेद करने के
लिए किराये पर लगा रखा है। इस तिकडमी दिल्ली ने यहां भी अपना जुगाड़ बिठा लिया है। 4000/-
के एवज़ में 500/- रुपये सौदा बुरा नहीं है। जिस चार्टर्ड बस से ऑफिस जाता हूँ रोज़ ही
नोट बदलवाने के रेट की चर्चा होती रहती है। रोज़ यह रेट बदलता भी रहता है। यहाँ भी रिटेलर
और होलसेल के रेट अलग-अलग हैं। रिटेल में जहां 4000/- के एवज़ में 500/- का दर है वहीं
होलसेल में 70:30 का दर चल रहा है जिसके 50:50 तक होने की सम्भावना है। इस सारे प्रकरण
में आम जन परेशान हो रहा है। जिस देश में लोग सिर्फ और सिर्फ अफवाहों पर ध्यान देते
हैं और इन अफवाहों के चक्कर में "नमक" तक की कालाबाज़ारी और होर्डिंग करने
में लग जाते हैं वहां रुपयों की किल्लत ने मानो लोगों को खर्चना ही भुला दिया है और
सारे देश को एक लंबी कतार में खड़ा कर दिया है। अपने देश की “ईमानदार जनता” की इन सब
गतिविधियों को देख जहां सरकार नोट बदलवाने के नियमों में नित्य नए बदलाव ला रही है
वहीं देश की जागरूक जनता भी नित्य इनके काट खोज लाती है। तू डाल डाल तो मैं पात पात।
इस डाल पात के खेल में कौन डाल पर होगा और कौन पात पर यह अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में
होने वाले चुनावों में साफ़ हो जायेगा। बिना काले धन देश की विभिन्न राजनैतिक पार्टियां
चुनाव कैसे लड़ती हैं यह देखना दिलचस्प होगा। यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि हाथी के दांत
खाने के और दिखाने के एक हैं या भिन्न।
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