Friday, 12 May 2017

आम और ख़ास की जद्दोजहद (12/05/2017)

सौजन्य श्री आर के लक्ष्मण
कहते हैं नाम का असर आदमी के काम में दिखता है। जैसा नाम वैसा काम। आजकल 'आम आदमी पार्टीमें मचे घमासान को देख कर यह सही भी लगता है। अपने नाम के ही अनुरूप आम आदमी पार्टी की हालत आम आदमी सी गई है। जैसे एक आम आदमी के हालात आज के दौर में नज़र आते हैं कुछ वैसे ही हालात इस आम आदमी पार्टी के भी नज़र आते हैं- आम आदमी की ही तरह यह पार्टी आज लुटा-पिटा और अपनो से ही धोखा खाया हुआ दिख पड़ता है। जिस प्रकार आम आदमी ज़िन्दगी से बेजार मुफलिसी में दिन काट रही है, यह पार्टी भी नित्य के नए-नए खुलासे से राजनीति से बेजार नज़र आती है। छोटे-छोटे विषयों पर भी आम आदमी जिस प्रकार कलह कर बैठता है बिलकुल वैसा ही नाटकीय मंचन देश की जनता को आज 'आम आदमी पार्टी' के आंतरिक कलह में दिख पड़ता है।

दूसरी ओर एक विदेशी एलन ओक्टावियम ह्यूम द्वारा बतौर 'सेफ्टी वाल्व' स्थापित और सत्तर साल तक देश पर राज करने वाली 'कांग्रेस' पार्टी अपने नाम की अनुरूप ही 'कौन से देश' की पार्टी बन कर रह गयी है- यह पता करना मुश्किल हुआ जाता है। कब कांग्रेस डिस्ग्रेस (Disgrace) में चली इसका सबब इसके आकाओं को भी नहीं है। बावजूद इसके इस पार्टी के राजकुमार और भविष्य के अध्यक्ष हर दूसरे माह गायब हो जाते हैं- कौन से देश गए हैं पता नहीं चलता। कांग्रेस 'कौन से देश' की पार्टी बन कर रह जाएगी या यह पार्टी रह पायेगी भी या नहीं इसका भी पता नहीं चलता। पर यह अवश्य है कि अपने नाम के ही अनुरूप कांग्रेस पार्टी अब इस देश की पार्टी नहीं रही और लगता है जल्द ही यह 'कौन से देश' की पार्टी बन जाएगी इसका खुलासा इसके राजकुमार कर देगें। यो भी घर को आग लग गयी है घर के चिराग से। पर चापलूसी का आलम यह है कि इसकी भी वाह-वाह हो रही है। वाह वाही तो तब भी हुई थी जब नीरो बंसी बजा रहा था और रोम जल रहा था। पर यह बात इस पार्टी के लोगों को समझ में नहीं आती। इस पार्टी से गांधीजी का असर तो कब का ख़त्म हो गया। अब जो दिख रहा है वह असर रोम का ही है। गांधीजी ने कभी देश के आम नागरिक से प्रभावित हो कर अपने वस्त्र तक त्याग कर आम जीवन जीने का संकल्प लिया था पर रोम के प्रभाव में आज की तारीख में ऐसा संकल्प लेने वाला इस पार्टी में कोई बचा नहीं। इसके विपरीत आम आदमी भी कैसे ख़ास बन सकता है इसके गुर इस पार्टी ने अवश्य 2004-2014 तक के अपने शासन काल में हुए विभिन्न घोटालों से सिखाने की कोशिश की। इन घोटालों ने तो यही साबित किया कि यह पार्टी अब गांधीजी की पार्टी तो हरगिज़ नहीं रही।

जब आम आदमी की बात चल रही है तो यह दीगर है यह इस देश की अजीब विडम्बना है कि आजकल यहाँ हर ख़ास अपने आप को आम साबित करने में लगा है और इसे प्रमाणित करने के लिए अपने आम अतीत की जोर-शोर से प्रचार करता नज़र आता है। दूसरी ओर हर आम आदमी ख़ास बनाने को लालायित तो रहता है, पर वस्तु-स्थिति यह है कि सरकार चाहे कुछ भी आश्वासन दे ले, देश में आम आदमी और ख़ास आदमी के बीच की पाट निरंतर चौड़ी होती चली गयी है। आप आम के घर खाना खा कर ख़ास से आम नहीं बन सकते- यह इस देश के नेताओं को समझ लेनी चाहिए। दूसरी ओर आम की तो यों भी कभी यह हसरत नहीं रही कि वो शोहरत और शासन की बुलंदियों को पाए, पर उसे यह बात भी समझ लेनी चाहिए ये केवल किसी कवि के रचनात्मक कलम का कमाल था कि वह यह मानने की मूर्खता कर बैठा कि "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" (रामधारी सिंह दिनकर) जितनी जल्दी यह सपना टूट जाए उतना अच्छा।

आप यह अवश्य सोच रहे होंगे कि मैंने दो पार्टियों के नाम और काम की समानता पर तो टिपण्णी कर डाली पर तीसरे पर नहीं। क्यों? जी हाँ, आपने सही सुना। मैं ट्रॉल होना नहीं चाहता। तो लगाइए नारा 'भारत माता की जय'!


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