जग में भीषण अन्धकार है,
जगो, तिमिर - नाशक, जागो,
जगो मंत्र - द्रष्टा, जगती के
गौरव, गुरु, शासक, जागो।
-राष्ट्रकवि रामधारी सिंह
दिनकर (अतीत के द्वार से)
पिछले दिनों जब मेरी चार्टेड बस गोल मार्किट से
आगे बढ़ी तो एक पोस्टर हर जगह चिपका देखा गया। पोस्टर लोधी समाज की एकता की अपील कर रहा
था। कुछ दिन पहले ही माहुरी समाज और इससे पहले रविदास समाज ने अपनी एकता को प्रदर्शित
करते हुए पोस्टर से दिल्ली के मुख्य नगर को पाट दिया था। इक्कीसवीं सदी के अपने भारत
देस में आज भी जातिगत सभा और सरकार पर जातिगत दवाब बनाने के इन हथकंडों से यह सोचने
पर मजबूर हो जाता हूँ क्या वास्तव में अपना देस आगे बढ़ रहा है अथवा इसके कदम पीछे की
ओर जा रहे हैं? दिन-ब-दिन यह रोग बढ़ता ही जाता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने इस मर्ज के इलाज के लिए जातिगत आरक्षण का प्रावधान
संविधान में दस वर्षों के लिए किया पर दवा ही दारू बन गयी जो घुन बन देश को अंदर ही
अंदर खोखला कर रहा है। आरक्षण का यह फ्रैंकेंस्टीन आज हमारा देस को जाति और धर्म के
इतने टुकड़ों में बाँट रहा है कि यह सोच कर हैरानी होती है की कभी इसी टूट को रोकने
के लिए महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित 'कम्युनल
अवार्ड' के विरोध में आमरण अनशन किया था।
आज देस निश्चय ही प्रगति के पथ पर है, अतः आरक्षण
का बना रहना कालभ्रम का भाव उत्पन्न करता है। क्या हम आज भी बीसवीं सदी में है अथवा
हर मायने में देस इक्कीसवीं सदी में पदार्पण कर चुका है- यह बहस का विषय हो सकता है।
यदि देस ने वास्तव में प्रगति किया होता तो आरक्षण का विस्तार क्योंकर होता? यह
इस बात का द्योतक है कि आरक्षण की आवश्यकता बढ़ी है- यह बढ़ी है क्योंकि इसी बदौलत जातिगत
नेताओं की दुकानदारी चलती है। इसकी आवश्यकता बढ़ी है क्योंकि इसी की बदौलत ये नेता देस
के विभिन्न वर्गों में द्वेष उत्पन्न कर अपनी रोटी सेंकते हैं। और यही वजह है कि अब
हर जाति अपने बल का प्रदर्शन करने पर तुला है और आये दिन दिल्ली में इन जातिगत सभाओं
का आयोजन होता रहता है। मजे की बात यह है कि इन जातिगत आयोजनों को देस के ही नागरिक
बढ़ावा दे रहे हैं- जाट आंदोलन की यादें अभी भी जेहन में ताज़ी है। इसी प्रकार गुजरात
में पटेल आंदोलन और महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन इस बात का गवाह है कि हम भारत के लोग
अपनी जात, धर्म, संप्रदाय आदि को अपने देस से ऊपर रख कर देख रहे हैं जो किसी भी देश
की एकता और अखंडता के लिए सही नहीं है। जब हम भारत के लोग भारत के लिए एकबद्ध होंगें
तभी टुकड़ा टुकड़ा समाज एकबद्ध होगा और तभी टुकड़ा टुकड़ा देस एक महादेश और महाशक्ति के
रूप में उभरेगा। प्रधान मंत्री का स्वतंत्रता दिवस पर देश को यह आह्वाहन कि सामूहिक
एकता ही विकास की सीढ़ी है सामयिक है और इस पर अमल किया जाना चाहिए। देश तभी वास्तव
में प्रगति करेगा। मुझे इंतज़ार है उस अरुणोदय का जब यह संभव होगा और हम होंगें कामयाब।
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