Saturday, 4 August 2018

अधर में धरती का स्वर्ग: दिल्ली डायरी में कश्मीर के चार पल (04/08/2018)



आज प्रातःअख़बारों में जम्मू कश्मीर पुलिस के एक कांस्टेबल मुदासीर अहमद लोन के आतंकवादियों द्वारा अगवा किये जाने का समाचार पुनः सुर्ख़ियों में था अल्लाह के फ़ज़ल से उसकी अम्मा की अपील का उन दहशतगर्दों पर माकूल असर हुआ और उन्होंने उस कांस्टेबल की जान बक्श दीपर हर माँ इतनी किस्मत वाली नहीं होती- न तो उन जवानों की माँ जिनके लाल दहशतगर्दों से अघोषित जंग में फनाह हो जाते हैं और न ही वो माँ जिनके लाल दहशतगर्दों के शिकार हो जाते हैंभला एक ज़ईफ़ सरकारी मुलाजिम किस तरह दहशतगर्दों के तथाकथित जिहाद में रोड़े अटका सकता है यह मेरी समझ के परे है पर कश्मीर में आज जो कुछ भी हो रहा है वह सब ही समझ से परे है पिछले सत्तर सालों में धरती का ज़न्नत कश्मीर एक ऐसा नासूर बन कर रह गया है जिसके खून से इस सूबे का हर घर जख्मी हैऔर ज़ख़्मी हुआ है इस देश का स्वाभिमान जो हर सुबह अपने जांबाज़ जवानों की शहीदी का मूक गवाह बन कर रह गया हैआज देस के हुक्मरान जो भी निर्णय ले रही है वो महज़ फोटोशूट बन कर रह गया हैयह सियासतदारों के लिए वोट का सबब तो बन रहा है किन्तु देस के भीतर अवाम के बीच की खाई को पाटने में न केवल असफल रहा है वरन इसे और भी चौड़ा करने का ही काम किया हैयह मंजर निश्चय ही तकलीफदेह हैमैं शाम ढले शेरे-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय के अतिथिशाला से ऊब कर निकल पड़ता हूँविश्व-प्रसिद्द शालीमार बाग़ पास ही हैमैं मीरकाबाद के चौक पर चाय के बहाने लोगों के अफ़साने सुनने बैठ जाता हूँचाय की दुकान पर बैठे दो वयोवृद्ध कश्मीरियों को यह गुमान हो गया था कि मैं एक सैलानी हूँइनमें से एक ने एक कुर्सी मेरी ओर बढ़ाते हुए मेरा अभिवादन किया "अस्सलाम अलेकुम" बेसाख्ता मैं भी बोल पड़ा "अलेकुम अस्सलाम जनाब" अमूमन हर कश्मीरी आपको देख कर आपका हालचाल अवश्य पूछता है- यह अनुभव न केवल विश्वविद्यालय के कैंपस के भीतर हुआ वरन मीरकाबाद में इस चाय के स्टाल पर भी हुआकश्मीर आने के मेरे मंतव्य जानने के बाद हमारी बातचीत का मुद्दा सबसे सामान्य विषय पर ठहर जाता है      


"कश्मीर में अमन चैन कब बहाल होगा"?-मैं पूछ बैठता हूँ   
"साहब आपका हिंदुस्तान तो हमें अपना मानता ही नहीं नेहरू से लेकर मोदीजी तक हमारे साथ केवल फरेब ही हुआ है"
अपने ही देस में अपने देस के लिए 'आपका हिंदुस्तान' लफ्ज़ सुन ऐसा लगा मानो सीने की गहराई में कुछ दरक सा गया हो
"पर आपने भी हिंदुस्तान को कब अपना माना? - मैंने भी संक्षिप्त प्रतिवाद किया
बेबाकी में मैं बोल गया पर उस वृद्ध ने मेरी बात का बुरा नहीं मानावरन मुस्कुराते हुए एक ने अपनी बात रखी "कभी आप भी तो पूछ सकते थे ऐसा क्यों? गैरों से कहा तुमने, गैरों से सुना तुमने, कुछ हमसे कहा होता कुछ हमसे सुना होताजनाब, ऐसा कौन सा मसला था जो बैठ कर आपस में सुलझाया नहीं जा सकता थाकिन्तु इसके लिए एक आपसी विश्वास की जरूरत थी जो यहाँ नदारत थीआतंकवादियों से निपटने का मतलब यह तो नहीं आप पुरे कौम को ही आतंकवादी मान बैठे इन सियासतदारों ने तो हमें पुरे देस में विलन बना दिया है"
मैं चुप हूँ ताकि मैं उनके जिगर के आग की आंच महसूस कर सकूं
"जनाब, हम तो दोनों और से पिसते हैं एक ओर आतंकवादी हैं जो हमारी मदद हमारी मर्ज़ी के खिलाफ लेते हैं और दूसरी और हिंदुस्तानी फौज है जो हमें इन दहशतगर्दों का पैरोकार मान बैठती है"
सहानुभूति के दो बोल के बजाय मैं हिम्मत कर पूछ ही बैठता हूँ- “अभी-अभी आपने एक गैर से हालचाल पूछ लिया फिर आपने अपने पड़ोसियों कश्मीरी पंडितों को अपने ही मुल्क से दर-बदर होने क्यों दिया? क्यों नहीं वादी के मुस्लिम कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े हुए?"
मेरे सवालों की तल्खी को नज़रअंदाज़ करते हुए उस बुजुर्ग ने कहा,-“जनाब, कश्मीरी पंडितों पर इन्हीं आतंकवादियों ने कहर बरपाया था हममे से कईयों ने अपने पडोसी कश्मीरी पंडितों की जान और उनके माल असबाब की रक्षा की किन्तु हर कौम में कुछ ऐसे गलीज़ आपको मिल ही जायेगें जिससे अमन का माहौल ख़राब होता है पर इससे आप पुरे कौम से तो बदला लेने नहीं लग जायेंगेंआज हिंदुस्तान में गौरक्षा के नाम पर जो हो रहा है उसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं कि आज हिंदुस्तान का हर हिन्दू असहिष्णु हो गया है"

इन गिले-शिकवों का कोई अंत नहीं हैबहरहाल ऐसे बहस में मुझे आशा की कोई किरण नज़र नहीं आतीएक-दूसरे पर दोषारोपण करने का यह अंतहीन सिलसिला सिमटने का नहीं है- ऐसा हम पिछले सत्तर वर्षों से देखते आये हैंआज समाज में जब दो भाई महज़ एक नाली के लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं उस समाज में सहिष्णुता की बात करना बेवकूफी हैतो फिर दोनों मुल्कों के हुक्मरानों यह उम्मीद रखना कि वे वर्षों पुराने इस मसले को कभी सुलझा भी पायेंगें यह सोचना भी बेईमानी हैमेरी चाय ख़त्म हो चुकी थीमैं उठ कर चल पड़ता हूँपास ही शालीमार बाग़ हैबताया गया कि यह शाम आठ बजे तक सैलानियों के लिए खुला रहता हैबीस रुपये के टिकट पर दो रुपये चालीस पैसे जीएसटी अदा कर बाग़ में दाखिल होता हूँजीएसटी अदा कर कम से कम यह तो लगा कि हम हिंदुस्तान में ही हैंध्यान बाग़ में खेलते कुछ बच्चों की ओर चला जाता है जो दुनिया से बेफिक्र बहते झरने का आनंद लेने में मशगूल हैं। 


दो बच्चे आपस में यों बात में मशरूफ हैं मानो कश्मीर के मुद्दे पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के सदर- ऐ- रियासतों के बीच गहन विमर्श चल रहा होकदाचित इस मसले को बच्चों पर छोड़ दिया जाए तो इसका हल निकल भी आयेज्यों-ज्यों हम उम्रदराज़ होते हैं त्यों-त्यों हम बचपन की अच्छाइयों को भूलते जाते हैंयदि कोई भूले-बिसरे इन अच्छाइयों पर अमल करता भी है तो उसे 'क्या बचपना है' कह झिड़क देते हैंपर मेरा मानना है कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए हमें उसी नेक-नियति और पाक-साफ़ व्यवहार की जरूरत है जिसे हमने अपने बचपन के साथ ही खो दिया हैसूर्य अस्त हो चला हैशालीमार बाग़ में खेलते हुए बच्चों को देख यह यकीन हो चला कि - हमारे बच्चे ही हमारी समस्याओं का समाधान निकालेगेंवो कहते हैं न “यकीन हो तो कोई रास्ता निकालता है हवा की ओट लेकर भी चराग़ जलता है” (मंज़ूर हाश्मी)।  इंशाल्लाह खुदा की नेमत धरती के इस जन्नत पर फिर न्योछावर हो- यह दुआ करते हुए मैं वापस अतिथिशाला को लौट चलता हूँअज़हर इनायती याद हो आते हैं "ये और बात है आंधी हमारे वश में नहीं, मगर चराग़ जलाना तो इख़्तियार में है

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