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सुनि
ससोच
कह
देबि
सुमित्रा।
बिधि
गति
बड़ि
बिपरीत
बिचित्रा॥
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी॥
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कल शाम की ही बात है। मेट्रो से सदा की भांति घर की ओर लौट रहा था जब
एक युवा को छींक आ गई और वो बेसाख्ता छींक पड़ा। हालांकि उसने नाक पर रुमाल किया किन्तु छींक की आवाज़ से मेट्रो के उस
कंपार्ट्मेंट में यात्रा कर रहे यात्रियों के चेहरे दहशत से इस कदर खौफजदा हो गए
जिससे सहज ही आजकल सर्वत्र ‘कोरोना’ से उपजे भय के रूप में देखा और महसूस किया जा सकता है। माल्थस ने कभी
चेताया था कि जब-जब मनुष्य सृष्टि पर काबिज होने की कोशिश करेगा प्रकृति उसे उसकी
औकात दिखा देगी। आजकल मानव और प्रकृति के बीच शह और मात के इस खेल की आवृति बढ़ गई
है। मनुष्य प्रकृति का वो प्राणी है जिसे अपनी बुद्धि का पर बड़ा घमंड है। किन्तु
आज वो अपनी इसी बुद्धि का बंदी बनकर रह गया है। आज मानव
जीवन कितने ही बंधनों में जकड़ा है। बचपन में कभी यह नहीं सोचा था कि कहीं आने जाने
के लिए आपकी फ्रीश्किंग की जाएगी। किन्तु आज यह रोजाना की एक सामान्य सामान्य प्रक्रिया
है। आज आप कहीं भी यात्रा करें चाहे वो मेट्रो हो अथवा हवाई-जहाज़ - आपकी
फ्रीश्किंग एक आवश्यक कारवाई है जिसके बिना आप कहीं ‘सुरक्षित’ यात्रा नहीं कर सकते। क्या पता कोई ‘होशियार’ मनुष्य आपके मौत का सामान लेकर यात्रा न कर रहा हो। मनुष्य वो ‘होशियार’ प्राणी है जिसने अपने विनाश के सामान ईज़ाद करने में महारथ हासिल है।
कहते हैं यह नन्हा सा वाइरस भी मानव ने ही ईजाद किया है।
यही हाल नई- नई बीमारियों के ईज़ाद करने को लेकर भी है। बचपन
में हैयर-कटिंग कभी कोई मुद्दा नहीं हुआ करता था। किन्तु आजकल हैयर-कटिंग के समय
यह आवश्यक है कि आप यह सुनिश्चित करें कि नाई आपके केश काटने के लिए जो ब्लेड इस्तेमाल कर
रहा है वो नया है, पहले से
इस्तेमाल किया हुआ नहीं। ‘एड्स’ के बाद ऐसे एहतियात हमारी जीवनशैली के
अभिन्न अंग बन चुके हैं। डेंगु ने बकड़ी के दूध का महत्व समझा दिया तो इस दिल्ली
में सर्वत्र व्याप्त प्रदूषण ने लोगों को मास्क पहन कर चलने पर विवश कर दिया। अब
इस ‘कोरोना’ वाइरस की वजह से
आधी से अधिक आबादी मास्क लगा कर चलने को बाध्य है। एक प्रदूषण ही क्या कम था जो ये ‘कोरोना’ भी जान की आफत बन प्रकट हो गया।। मेरा मानना
है ये सारे वाइरस और बीमारियाँ आधुनिक जीवनशैली की देन हैं। आज के दौर में मानव
जीवन की निश्छलता छिन-भिन्न हो चुकी है। और इस सब का ज़िम्मेवार वो ‘होशियार’ मानव स्वयं है जिसे इस बात का दंभ है
कि प्रकृति ने समस्त जीवों में उसे और केवल उसे ही बुद्धि से नवाजा है। समस्त
संसाधनों पर अनुचित नियंत्रण के ये दुष्परिणाम हैं।
अब आज स्थिति यह बन आई है कि आज का मानव समस्त जद्दोजिहद अपनी
नन्ही सी जान की हिफाज़त के लिए कर रहा है ताकि उसकी सुरक्षा प्रकृति के उस नन्हें
से वाइरस से की जा सके। जान है जहान है। यह संभव है कुछ महीने में वो इस वाइरस का इलाज़
ढूंढ निकाले। किन्तु इस बात की क्या गारंटी है कि तब प्रकृति कोई अन्य वाइरस लेकर डराने
न आ जाए। किन्तु इस नन्ही सी जान को बचाने के लिए मनुष्य द्वारा किए जा रहे ये
समस्त जद्दोजिहद तब बेमानी लगने लगते हैं जब वो इसे कभी आपसी रंजिश, तो कभी ‘धर्म’ के रक्षार्थ, तो कभी संपत्ति के लिए स्वयं ही
नष्ट करने पर आमादा हो जाता है। मेरा मानना है जब मनुष्य यह करता है तो प्रकृति
उसे उसकी औकात दिखाती है और विनाश के ऐसे विकराल रूप लेकर प्रकट होती है जैसा इस ‘कोरोना’ वाइरस के मामले में हो रहा है। कदाचित
यह प्रकृति का हम मनुष्य को आगाह करने का तरीका है कि जिस नन्ही सी जान को समाप्त
करने के पीछे वो कभी-कभी राक्षस बन जाता है उसे वो मनुष्यों से बेहतर तरीके से
समाप्त कर सकता है। अतः वो कभी प्रकृति सार्वभौम सत्ता को चुनौती देने की धृष्टता
न करे। वो इस नन्ही जी जान की कीमत को समझे और आपसी भाई-चारे को बनाए रखें। मानव
जीवन अमोल है; इसे धर्म, जाति
अथवा संपत्ति के नाम पर नष्ट करना मनुष्यता नहीं है।

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