देश
के विभिन्न प्रांतों से दिल्ली आये छात्र जल्द ही दिल्ली के रंग-ढंग में ढल जाते हैं;
किन्तु इनकी बोल-चाल और पहनावे से अक्सर इनके प्रान्त का अंदेशा हो जाता है। इनकी बातचीत
के मसले तो माशाल्लाह लाजवाब होती हैं। इनकी समस्याएं तो और भी रोचक होती हैं। इनके
ठहाके इनकी बातचीत पर ज्यादा भारी पड़ते हैं। जाने क्यों इस उम्र में बिना मुद्दे ही
ठहाके लगते हैं। संभवतः युवावस्था की यही पहचान है-उन्मुक्त और पंछियों सा स्वतंत्र
जीवन। मुद्दे की बातें कब बे-मुद्दा हो जाती हैं यह इन्हें पता भी नहीं चलता पर इनपर
गिद्ध दृष्टि जमाये हमारे राजनेताओं को बैठे-बिठाये एक मुद्दा अवश्य मिल जाता है जिसे
वे लपक कर पकड़ते हैं और अपनी राष्ट्रवादिता के तौर पर बतौर सबूत देश के समक्ष अपनी
ही पीठ थपथपाने के लिए रखते हैं। फिर किसानों की अवस्था से इन राजनेताओं को कोई मतलब
नहीं रहता। न ही सीमा पर मरने वाले जवानों से या फिर नक्सलियों के शिकार होने वाले
युवाओं के प्रति इनकी कोई जवाबदेही बची रह जाती है। यह तभी चेतती है जब घटना घट जाती
है- जैसे पिछले दिनों स्कूल में एक छात्र के मृत्यु के बाद ही सरकार की नींद टूटी और
स्कूल प्रशासन को चुस्त करने के तमाम निर्णय लिए गए। प्रशासन का सारा पौरुष या तो इन
युवा छात्रों पर झलकता है या फिर जंतर-मंतर पर धरना पर बैठे सेवानिवृत वृद्ध फौजियों
पर - यह हमारे देश की विडम्बना है। छात्रों के इस समूह के बहस का मुद्दा था कि क्या
विमुद्रीकरण के बाद देश से काला धन समाप्त हो गया? क्या चुनाव अब काळा धन के बिना संपन्न
होने लगे हैं? क्या देश से भ्रष्टाचार अब समाप्त हो गया है? बात घूम फिर कर दिल्ली
विश्वविद्यालय में पिछले दिनों छात्र संघ के लिए संपन्न हुए चुनाव पर आ गयी। इन युवाओं
के बातचीत का लब्बोलुवाब यह था कि किस कदर ये चुनाव राष्ट्रीय पार्टियों के आकाओं को
फिक्रमंद करते हैं। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी चुनाव में हार पर सदमे में आ गयी
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इस सफलता को राहुल गाँधी से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
चापलूसी की यह पराकाष्ठा है। हालाँकि यह चापलूसी संस्कृति अब हर राजनैतिक पार्टी की
आम संस्कृति बन गयी है किन्तु कांग्रेस ने इस चापलूसी के चक्कर में जिस हद तक आम जनता
से अपने संपर्क तोड़ लिए, तीन साल बाद पुनः उसी की पुनरावृति निश्चय ही यह दर्शाता है
कि कांग्रेस ने पराजयों से कोई सबक नहीं सीखी है। ऐसा छात्रों के मंडल का मानना था
जो विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर बात-चीत करते हुए उतर गया था।
मुझे तो ऐसा कदापि
नहीं लगता पर क्या आप ऐसा मानते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय में गत दिनों संपन्न हुए
छात्र संघ के चुनाव में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों पर कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन नेशनल
स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया की उम्मीदवारों के जीत में राहुल गाँधी के बर्कले में
दिए गए भाषण का कोई रोल था?
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