सेंट्रल
सेक्रेटेरिएट से समयपुर बदली के बीच मेट्रो के सफर में बहुदा छात्रों से सामना हो जाता
है। पिछले दिनों छात्रों के एक ऐसे ही जत्थे से भेंट हो गयी। मैं इन नवजवानों
की बातें सुनता हूँ और देश और समाज में आने वाले दिनों बहने वाली बयारों का अंदाज़ा
लगा लेता हूँ। बातों-बातों में इन छात्रों में से एक ने कहा कि वह साढे दो घंटे से
उनका इंतज़ार कर रहा था। दूसरे ने उसे टोका कि साढे दो घंटे नहीं बल्कि ढाई घंटे से
इंतज़ार कर कर रहा था, ऐसा कहो। "पर जब आधे को साढ़े कहते हैं जैसे साढ़े तीन घंटे,
साढ़े चार रुपये तो फिर साढ़े दो घंटे में क्या गलत है?- दूसरे ने तर्क किया, “भगवन
जाने हिंदी इतनी कॉम्प्लिकेटेड क्यों है?" मैं उसकी बातें सुन दंग रह गया।
हाय
री हिंदी! आज स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद यह देश की राजभाषा बन कर सिमट गयी है।
14 सितम्बर देश भर में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। किन्तु यह त्यौहार केवल
सरकारी दफ्तरों में ही मनाया जाता है। आज अपने ही देश में हिंदी मजाक का विषय बन कर
रह गयी है। रोमन में हिंदी लिखना और हिंदी के शब्दों को तोड़-मरोड़ कर अथवा छोटे
स्वरुप में पेश करने से हिंदी का कोई भला नहीं होने वाला है।
मैं यह नहीं मानता कि हिंदी को जीवित रखने के लिए शुद्ध हिंदी ही लिखी जाए पर इतना
तो अवश्य है कि हिंदी को देवनागरी में लिखी जाए न की रोमन में।
सितंबर माह शुरू होते ही भारत सरकार के विभिन्न विभाग और मंत्रालय के द्वारा "हिंदी
पखवाड़ा" मनाने मात्र से भी हिंदी का भला नहीं होने वाला है- ऐसी मेरी मान्यता
है। इन कार्यक्रमों में सरकारी बाबू हिंदी
प्रतियोगिताओं में भाग ले नगद पुरस्कार प्राप्त करते हैं। ये वही कर्मचारी हैं
जिनसे संचिकाओं पर हिंदी में टिप्पणी करने कहा जाए तो इनकी नानी मरती है, पर इनाम
के लालच में इन पंद्रह दिन में सभी विभागों और मंत्रालयों में हिंदी की धूम मची
रहती है और एक बार इनाम के बँट जाने के बाद हिंदी को उसी ठन्डे बस्ते में डाल दिया
जाता है अगले वर्ष तक के लिए। जैसे हर वर्ष पितृ
पक्ष में आम हिन्दू अपने पितरों की याद में गयाजी में पिंड दान करता है, भारत
सरकार के कर्मचारियों के लिए "हिंदी पखवाड़ा" हिंदी का पिंड-दान देने
समान ही है। ऐसी स्थिति में हिदी का भला नहीं होने
वाला है।
कम से कम सरकार कर्मचारियों को तो हिंदी में काम करने को बाध्य कर ही सकती
है। इसी प्रकार हिंदी को शिक्षा का अभिन्न
अंग भी बनाया जा सकता है। यदि
ऐसा नहीं हुआ तो आज हम जैसी भी हिंदी छात्रों से सुन रहे हैं वो भी अगली पीढ़ी तक अपने ही देश से विलुप्त
हो जाएगी।

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